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अज़ीज़ बचपन

अज़ीज़ बचपन
वो शहर वो अपना मकानं याद आता है, वहां गुज़रा वो जिंदगी का स़फर याद आता है। वो दोस्त,वो गलियां,वो ख़ेल की दुनिया, उन सब का हँसता चेहरा याद आता हैं। वो देर तक चाँद को तकना,वो बादल में खो जाना, टूटते तारे से जो मांगा था वो सपना याद आता हैं।